शहरयार और शाहजमाँ की कहानी | Story Of Shaharyar And Shahjaman

फारस देश भी हिंदुस्तान और चीन के समान था और कई नरेश उसके अधीन थे। वहाँ का राजा महाप्रतापी और बड़ा तेजस्वी था और न्यायप्रिय होने के कारण प्रजा को प्रिय था। उस बादशाह के दो बेटे थे जिनमें बड़े लड़के का नाम शहरयार और छोटे लड़के का नाम शाहजमाँ था।

दोनों राजकुमार गुणवान, वीर धीर और शीलवान थे। जब बादशाह का देहांत हुआ तो शहजादा शहरयार गद्दी पर बैठा और उसने अपने छोटे भाई को जो उसे बहुत मानता था तातार देश का राज्य, सेना और खजाना दिया। शाहजमाँ अपने बड़े भाई की आज्ञा में तत्पर हुआ और देश के प्रबंध के लिए समरकंद को जो संसार के सभी शहरों से उत्तम और बड़ा था अपनी राजधानी बनाकर आराम से रहने लगा।

जब उन दोनों को अलग हुए दस वर्ष हो गए तो बड़े ने चाहा कि किसी को भेजकर उसे अपने पास बुलाए। उसने अपने मंत्री को उसे बुलाने की आज्ञा दी और मंत्री यह आज्ञा पाकर बड़ी धूमधाम से विदा हुआ। जब वह समरकंद शहर के समीप पहुँचा तो शाहजमाँ यह समाचार सुनकर उसकी अगवानी को सेना लेकर अपनी राजधानी से रवाना हुआ और शहर के बाहर पहुँचकर मंत्री से मिला। वह उसे देखकर प्रसन्न हुआ। शाहजमाँ अपने भाई शहरयार का कुशलक्षेम पूछने लगा। मंत्री ने शाहजमाँ को दंडवत कर उसके भाई का हाल कहा।

shaharyar and shahjaman ke dard bhari kahani

वह मंत्री बादशाह शहरयार का परम आज्ञा पालक था और उससे प्रेम करता था। शाहजमाँ ने उससे कहा कि भाई! मेरे अग्रज ने तुम्हें मुझे लेने को भेजा इस बात से मुझको अत्यंत हर्ष हुआ। उनकी आज्ञा मेरे शिरोधार्य है। अगर भगवान ने चाहा तो दस दिन में यात्रा की तैयारी कर के और शासन में अपना प्रतिनिधि नियुक्त कर तुम्हारे साथ चलूँगा। तुम्हारे और तुम्हारी सेना के लिए खाने-पीने का प्रबंध सब यहीं हो जाएगा। अतएव तुम इसी स्थान पर ठहरो। अतएव उसी स्थान पर खाने-पीने आदि की व्यवस्था कर दी गई और वे वहाँ रहे।

इस अवसर पर बादशाह ने यात्रा की तैयारियाँ की और अपनी जगह अपने विश्वास पात्र मंत्री को नियुक्त किया। एक दिन सायं अपनी बेगम से जो उसे अति प्रिय थी विदा ली और अपने सेवकों और मुसाहिबों को लेकर समरकंद से चला और अपने खेमे में पहुँचकर मंत्री के साथ बातचीत करने लगा। आधी रात होने पर उसकी इच्छा हुई कि एक बार बेगम से फिर मिल आऊँ। वह सबसे छुपकर अकेला ही महल में पहुँचा। बेगम को उसके आने का संदेह तक न था; वह अपने एक तुच्छ और कुरूप सेवक के साथ सो रही थी।

शाहजमाँ सोचकर आया था कि बेगम उसे देखकर अति प्रसन्न होगी। उसे दूसरे मर्द के साथ सोते देखकर एक क्षण के लिए उसे काठ मार गया। कुछ सँभलने पर सोचने लगा कि कहीं मुझे दृष्टि-भ्रम तो नहीं हो गया। लेकिन भलीभाँति देखने पर भी जब वही बात पाई तो सोचने लगा यह कैसा अनर्थ है कि मैं अभी समरकंद नगर की रक्षा भित्ति से बाहर भी नहीं निकला और ऐसा कर्म होने लगा।

वह क्रोधाग्नि में जलने लगा और उसने तलवार निकालकर ऐसे हाथ मारे कि दोनो के सिर कट कर पलँग के नीचे आ गए। इसके बाद दोनों शवों को पिछवाड़े की खिड़की से नीचे गड्ढे में फेंककर वह अपने खेमे में वापस आ गया। उसने किसी से रात की बात न बताई।

दूसरे दिन प्रातः ही सेना चल पड़ी। उसके साथ के और सब लोग तो हँसी-खुशी रास्ता काट रहे थे किंतु शाहजमाँ अपनी बेगम के पाप कर्म को याद कर के दुखी रहता था और दिनों दिन उसका मुँह पीला पड़ता जाता था। उसकी सारी यात्रा इसी कष्ट में बीती।

जब वह हिंदुस्तान की राजधानी के समीप पहुँचा और शहरयार ने यह सुना तो वह अपने सारे दरबारियों को लेकर शाहजमाँ की अभ्यर्थना के लिए आया। जब दोनों एक-दूसरे के पास पहुँचे तो अपने-अपने घोड़े से उतर कर गले मिले और कुछ देर तक एक-दूसरे की कुशलक्षेम पूछ कर बड़े समारोहपूर्वक रवाना हुए।

शहरयार ने शाहजमाँ को उस महल में ठहराया जो उसके लिए पहले से सजाया गया था और जहाँ से उद्यान दिखाई देता था। वह महल बड़ा और राजाओं के स्वागतयोग्य था। फिर शहरयार ने अपने भाई से स्नान करने को कहा। शाहजमाँ ने स्नान कर के नए कपड़े पहने और दोनों भाई महल के मंच पर बैठकर देर तक वार्तालाप करते रहे। सारे दरबारी दोनों बादशाहों के सामने अपने-अपने उपयुक्त स्थान पर खड़े रहे। भोजनोपरांत भी दोनों बादशाह देर तक बातें करते रहे।

जब रात बहुत बीत गई तो शहरयार अपने भाई को आतिथ्य गृह में छोड़कर अपने महल को चला गया। शाहजमाँ फिर शोकाकुल होकर अपने पलँग पर आँसू बहाता हुआ लोटता रहा। भाई के सामने वह अपना दुख छुपाए रहा लेकिन अकेला होते ही उस पर वही दुख सवार हो गया और उसकी पीड़ा ऐसी बढ़ गई जैसे उसकी जान लेकर ही छोड़ेगी। वह एक क्षण के लिए भी अपनी बेगम का दुष्कर्म भुला नहीं पाता था। वह अक्सर हाय हाय कर उठता और हमेशा ठंडी साँसें भरा करता। उसे रातों को नींद नहीं आती थी। इसी दुख और चिंता में उसका शरीर धीरे-धीरे घुलने लगा।

शहरयार ने उसकी यह दशा देखी तो विचार किया कि मैं शाहजमाँ से इतना प्रेम करता हूँ और उसकी सुख-सुविधा का इतना खयाल रखता हूँ फिर भी सदैव ही इसे शोक सागर में निमग्न देखता हूँ। मालूम नहीं इसे अपने राज्य की चिंता खाए जाती है या अपनी बेगम का विछोह सताता है। मैंने इसे यहाँ बुलाकर बेकार ही इसे शोक संताप में डाल दिया। अब उचित होगा कि इसे समझा-बुझा कर और उत्तमोत्तम भेंट वस्तुएँ देकर समरकंद वापस भेज दूँ ताकि इसका दुख दूर हो सके।

यह सोचकर उसने हिंदुस्तान देश की बहुमूल्य वस्तुएँ थालों में लगाकर शाहजमाँ के पास भेजीं और उसका जी बहलाने के लिए तरह-तरह के खेल-तमाशे करवाए लेकिन शाहजमाँ की उदासी कम नहीं हुई बल्कि बढ़ती ही गई। फिर शहरयार ने अपने दरबारियों से कहा कि सुना है यहाँ से दो दिनों की राह के बाद एक घना जंगल है और वहाँ अच्छा शिकार मिलता है इसलिए मैं वहाँ शिकार खेलने जाना चाहता हूँ; तुम लोग भी तैयार होकर मेरे साथ चलो और शाहजमाँ से भी चलने को कहो क्योंकि शिकार में उसका जी लगेगा और उसका चित्त प्रसन्न होगा।

शाहजमाँ ने निवेदन किया कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है, इस कारण मुझे शिकार पर जाने से माफ करें। शहरयार ने कहा – अच्छी बात है, अगर तुम्हारा यहीं रहने को जी चाहता है तो रहो लेकिन मैं तैयारी कर चुका हूँ, मेरे अपने भृत्यों के साथ शिकार के लिए जाता हूँ।

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शहरयार के जाने के बाद शाहजमाँ ने अपने निवास स्थान के द्वार अंदर से बंद कर लिए और एक खिड़की पर जा बैठा। वहाँ से शाही महल का उद्यान दिखाई देता था। शाहजमाँ सुवासित पुष्पों और पक्षियों के कलरव से अपना जी बहलाने लगा। लेकिन मकान और बाग की शोभा से जी बहलाने पर भी उसे अपनी पत्नी के दुराचार की कचोट बनी रहती।

जब संध्या हुई तो शाहजमाँ ने देखा कि राजमहल का एक चोर दरवाजा खुला और उसमें से शहरयार की बेगम बीस अन्य स्त्रियों के साथ निकली। वे सब उत्तम वस्त्रों और अलंकारों से शोभित थीं और इस विश्वास के साथ कि सब लोग शिकार पर चले गए हैं, बाग में आ गईं। शाहजमाँ खिड़की में छुप कर बैठ गया और देखने लगा कि वे क्या करती हैं।

दासियों ने उन लबादों को उतार डाला जो पहन कर वे महल से निकली थीं। अब उनकी सूरत स्पष्ट दिखाई देने लगी। शाहजमाँ को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि जिन बीसों को उसने स्त्री समझा था उनमें से दस हब्शी मर्द थे। उन दसों ने अपनी-अपनी पसंद की दासी का हाथ पकड़ लिया। सिर्फ बेगम बगैर मर्द की रह गई। फिर बेगम ने आवाज दी, ‘मसऊद, मसऊद’। इस पर एक हृष्ट-पुष्ट हब्शी युवक जो उसकी आज्ञा की प्रतीक्षा में था एक वृक्ष से उतर कर बेगम की ओर दौड़ा और उसका हाथ पकड़ लिया।

उन ग्यारह हब्शियों ने दस दासियों और बेगम के साथ क्या किया उसका वर्णन मैं लज्जावश नहीं कर सकूँगा। इसी भाँति वे आधी रात तक बाग में विहार करते रहे। फिर बाग के हौज में नहा कर बेगम और उसके साथ आए बीस मर्द औरतों ने अपने कपड़े पहने और जिस चोर दरवाजे से आए थे उसी से महल में चले गए और मसऊद भी बाग की दीवार फाँद कर बाहर चला गया।

यह कांड देखकर शाहजमाँ को घोर आश्चर्य हुआ। उसने सोचा कि मैं तो दुखी हूँ ही, मेरा बड़ा भाई मुझ से भी अधिक दुखी है। यद्यपि वह अत्यंत शक्तिशाली और वैभवशाली है तथापि इस दुष्कर्म को रोकने में असमर्थ है, फिर मैं इतना शोक क्यों करूँ। जब मुझे मालूम हो गया कि यह नीच कर्म संसार में अक्सर ही होता है तो मैं बेकार ही स्वयं को शोक सागर में डुबोए दे रहा हूँ। यह सोचकर उसने सारी चिंता छोड़ दी और साधारण रूप से रहने लगा। पहले उसकी भूख मिट गई थी, अब वह जाग गई और वह नाना प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन मँगाकर खाने लगा और संगीत-नृत्य आदि का आनंद लेने लगा।

जब शहरयार शिकार से लौटा तो शाहजमाँ ने बड़ी प्रसन्नतापूर्वक उसका स्वागत किया। शहरयार ने उसे शिकार किए हुए बहुत से जानवर दिखाए और कहा कि बड़े खेद की बात है कि तुम शिकार पर नहीं गए, वहाँ बड़े आनंद की जगह है। शाहजमाँ बादशाह की हर बात का हँसी-खुशी उत्तर देता था।

शहरयार ने सोचा था कि वापसी पर भी शाहजमाँ को दुख और शोक में डूबा पाएगा लेकिन इसके विपरीत उसे प्रसन्न और संतुष्ट देखकर बोला ‘ऐ भाई, भगवान को बड़ा धन्यवाद है कि मैंने थोड़ी ही अवधि में तुम्हें प्रसन्न और व्याधिमुक्त देखा। अब मैं तुम्हें सौगंध देकर एक बात पूछता हूँ, तुम वह बात जरूर बताना। शाहजमाँ ने कहा, ‘जो बात भी आप पूछेंगे मैं अवश्य बताऊँगा।’

शहरयार ने कहा, ‘जब तुम अपनी राजधानी से यहाँ आए थे तो मैंने तुम्हें शोक सागर में डूबा देखा था। मैंने तुम्हारा चित्त प्रसन्न करने के लिए अनेक उपाय किए, भाँति-भाँति के खेल-तमाशे करवाए किंतु तुम्हारी दशा जैसी की तैसी रही। मैंने बहुत सोचा कि इस दुख का कारण क्या हो सकता है किंतु इसके सिवा कोई कारण समझ में नहीं आया कि तुम्हें अपनी बेगम के विछोह का दुख है और राज्य प्रबंध की चिंता है। किंतु अब क्या बात हुई जिससे तुम्हारा दुख और चिंता दूर हो गई?

शाहजमाँ यह सुनकर मौन रहा किंतु जब शहरयार ने बार-बार यही प्रश्न पूछा तो वह बोला, ‘आप मेरे मालिक हैं मुझ से बड़े हैं; मैं इस प्रश्न का उत्तर न दूँगा क्योंकि इसमें बड़ी निर्लज्जता की बात है।’ शहरयार ने कहा कि जब तक तुम मुझे यह न बताओगे तब तक मुझे चैन न आएगा। शाहजमाँ ने विवश होकर अपनी बेगम के कुकर्म का सविस्तार वर्णन किया और कहा कि मैं इसी कारण दुखी रहता था।

शहरयार ने कहा, ‘भैय्या, यह तो तुमने बड़े आश्चर्य की, असंभव-सी बात बताई। यह तो तुमने बड़ा अच्छा किया कि ऐसी व्यभिचारिणी को उसके प्रेमी सहित मार डाला। इस मामले में कोई तुम्हें अन्यायी नहीं कह सकता। मैं तुम्हारी जगह होता तो मुझे एक स्त्री को मारने से संतोष न होता, हजार स्त्रियों को मार डालता। बताओ कि मेरे बाहर जाने पर यह शोक किस प्रकार दूर हुआ?’

शाहजमाँ ने कहा, ‘मुझे यह बात कहते डर लगता है कि ऐसा न हो कि यह सुनकर आपको मुझसे भी अधिक दुख हो।’ शहरयार ने कहा कि भाई, तुमने यह कह कर मेरी उत्कंठा और बढ़ा दी है; मुझे अब इसे सुने बगैर चैन न आएगा इसलिए यह बात जरूर बताओ। विवश होकर शाहजमाँ ने मसऊद, दसों दासियों और बेगम का सारा हाल बताया और बोला, यह घटना मैंने अपनी आँखों से देखी है और समझ लिया है कि सारी स्त्रियों के स्वभाव में दुष्टता और पाप होता है। और आदमी को चाहिए कि उनका भरोसा न करे। मुझे यह सारा कांड देखकर अपना दुख भूल गया है और इसीलिए मैं नीरोग और प्रसन्नचित्त दिखाई देता हूँ।’

यह हाल सुनकर भी शहरयार को अपने भाई के कथन पर विश्वास न हुआ। वह क्रुद्ध स्वर में बोला, ‘क्या हमारे देश की सारी बेगमें व्यभिचारिणी हैं? मुझे तुम्हारे कहने का विश्वास नहीं होगा जब तक मैं खुद अपनी आँखों से यह न देख लूँ। संभव है तुम्हें भ्रम हुआ हो।’ शाहजमाँ ने कहा, ‘भाई साहब, आप खुद देखना चाहते हैं तो ऐसा कीजिए कि दुबारा शिकार के लिए आज्ञा दीजिए। हम आप दोनों फौज के साथ शहर से कूच कर के बाहर चलें। दिन भर अपने खेमों में रहें और रात को चुपचाप इसी मकान में आ बैठें। फिर निश्चय ही आप वह सारा व्यापार अपनी आँखों देख लेंगे जो मैंने आपको बताया है।’

शहरयार ने यह बात स्वीकार कर के दरबारियों को आज्ञा दी कि कल मैं फिर शिकार को जाऊँगा। अतः दूसरे दिन प्रातःकाल ही दोनों भाई शिकार को चले और शहर के बाहर जाकर अपने खेमों में ठहरे। जब रात हुई तो शहरयार ने मंत्री को बुलाकर आज्ञा दी कि मैं एक जरूरी काम से जा रहा हूँ, तुम फौज के किसी आदमी को यहाँ से जाने न देना। तत्पश्चात दोनों भाई घोड़ों पर सवार होकर गुप्त रूप से शहर में आए और सवेरा होने के पहले ही शाहजमाँ के महल की उसी खिड़की में आ बैठे जिससे शाहजमाँ ने सारा कांड देखा था।

सूर्योदय के पूर्व ही महल का चोर दरवाजा खुला और कुछ देर में बेगम अपने उन्हीं स्त्री वेशधारी हब्शियों के साथ वहाँ से निकल कर बाग में आई और मसऊद को पुकारा।

यह सारा हाल – जो न कहने के योग्य है न सुनने के – देखकर शहरयार अपने मन में कहने लगा कि हे! भगवान, यह कैसा अनर्थ है कि मुझ जैसे महान नृपति की पत्नी ऐसी व्यभिचारणी हो। फिर वह शाहजमाँ से बोला कि यह अच्छा रहेगा कि हम इस क्षणभंगुर संसार को जिसमें एक क्षण आनंद का होता है दूसरा दुख का, छोड़ दें और अपने देशों और सेनाओं का परित्याग कर के अन्य देशों में शेष जीवन काटें और इस घृणित व्यापार के बारे में किसी से कुछ न कहें।

शाहजमाँ को यह बात पसंद नहीं आई किंतु अपने भाई की अत्यंत दुखी दशा देखकर उसने इनकार करना ठीक न समझा और बोला, ‘भाई साहब, मैं आपका अनुचर हूँ और आपकी आज्ञा को पूर्ण रूप से मानूँगा। लेकिन मेरी एक शर्त है। जब आप किसी व्यक्ति को अपने से अधिक इस दुर्भाग्य से पीड़ित देखें तो अपने देश को लौट आएँ।’

शहरयार ने कहा, ‘मुझे तुम्हारी यह शर्त स्वीकार है लेकिन मेरा विचार है कि संसार में किसी मनुष्य को हमारे जैसा दुख नहीं होगा।’ शाहजमाँ ने कहा, ‘थोड़ी-सी ही यात्रा करने पर आपको इस बात का पता अच्छी तरह से चल जाएगा।’

अतएव वे दोनों छुप कर एक सुनसान रास्ते से नगर के बाहर एक ओर को चले। दिन भर चलने के बाद रात को एक पेड़ के नीचे लेट कर सो रहे। दूसरे दिन प्रातःकाल वे वहाँ से भी आगे चले और चलते-चलते एक मनोरम वाटिका में पहुँचे जो एक नदी के तट पर बनी हुई थी। इस वाटिका में दूर-दूर तक घने और बड़े-बड़े वृक्ष लगे थे। वहाँ एक वृक्ष के नीचे बैठकर वे सुस्ताने लगे और बातचीत करने लगे।

थोड़ी ही देर हुई थी कि एक भयानक शब्द सुनकर दोनों अत्यंत भयभीत हुए और काँपने लगे। कुछ देर में देखा कि नदी के जल में दरार हुई और उसमें से एक काला खंभा निकलने लगा। वह इतना ऊँचा हो गया कि उसका ऊपरी भाग आकाश के बादलों में लुप्त हो गया। यह कांड देखकर दोनों भाई और भी भयभीत हुए और एक ऊँचे वृक्ष पर चढ़ कर उसकी डालियों और पत्तों में छुपकर बैठ गए।

उन्होंने देखा कि काला खंभा नदी के तट की ओर बढ़ने लगा और तट पर आकर एक महा भयानक दैत्य के रूप में परिवर्तित हो गया। अब वे दोनों और भी घबराए और एक और ऊँची डाल पर जा बैठे। दैत्य नदी तट पर आया तो उन्होंने देखा कि उसके सिर पर एक सीसे का बड़ा और मजबूत संदूक है जिसमें पीतल के चार ताले लगे हैं।

दैत्य ने नदी तट पर आकर सिर से संदूक उतारा और उसी वृक्ष के नीचे रख दिया जहाँ दोनों भाई छुपे थे। फिर उसने कमर से लटकती हुई चार चाभियों से संदूक के चारों ताले एक-एक कर के खोले। संदूक खोला तो उसमें से एक अति सुंदर स्त्री निकली जो उत्तमोत्तम वस्त्राभूषणों से अलंकृत थी। दैत्य ने स्त्री को प्रेम दृष्टि से देखा और कहा, ‘प्रिये, तू सुंदरता में अनुपम है। बहुत दिन हो गए जब मैं तुझे तेरे विवाह की रात को उड़ा लाया था। इस सारे काल में तू बड़ी निष्कलंक और मेरे प्रति वफादार रही है।

मुझे इस समय बड़ी नींद आ रही है इसलिए तेरे निकट सोना चाहता हूँ।’ यह कहकर वह महा भयानक आकृति वाला दैत्य उस स्त्री की जंघा पर सिर रख कर सो रहा। उसका शरीर इतना विशाल था कि उसके पाँव नदी के जल को छू रहे थे। सोते समय उसकी साँस का स्वर ऐसा हो रहा था जैसे बादल गरज रहे हों। सारा वातावरण उस ध्वनि से कंपायमान हो रहा था।

एक बार संयोग से जब स्त्री ने ऊपर की ओर देखा तो उसे पत्तियों में छुपे हुए दोनों भाई दिखाई दिए। उसने दोनों को नीचे उतरने का संकेत किया। उसके उद्देश्य को समझकर दोनों का भय और बढ़ा। दोनों ने इशारे ही से उससे विनती की कि हमें पेड़ ही पर छुपा रहने दो। स्त्री ने धीरे से दैत्य का सिर अपनी गोद से उतारकर पृथ्वी पर रख दिया और उठकर उनको धैर्य देते हुए बोली कि कोई भय की बात नहीं है, तुम नीचे उतर आओ और मेरे समीप बैठो। उसने यह भी धमकी दी कि अगर न आओगे तो मैं दैत्य को जगा दूँगी और वह तुम दोनों को समाप्त कर देगा।

यह सुनकर वे बहुत डरे और चुपचाप नीचे उतर आए। वह स्त्री मुस्कारती हुई दोनों का हाथ पकड़ कर एक वृक्ष के नीचे ले गई और उनसे अपने साथ संभोग करने को कहा। पहले तो उन दोनों ने इनकार किया किंतु फिर उसकी धमकी से डर कर वह जैसा चाहती थी उसके साथ कर दिया। इसके बाद स्त्री ने उनसे उनकी एक-एक अँगूठी माँग ली।

फिर उसने एक छोटी-सी संदूकची निकाली और उनसे पूछा कि जानते हो इसमें क्या है और किसलिए है? उन्होंने कहा, हमें नहीं मालूम, तुम बताओ इसमें क्या है। उस सुंदरी ने कहा, इसमें उन लोगों की निशानियाँ हैं जो तुम्हारी तरह मुझसे संबंध कर चुके हैं। ये अट्ठानबे अँगूठियाँ थीं और तुम्हारी दो मिलने से सौ हो गईं।

इस दैत्य की इतनी कड़ी निगरानी के बाद भी मैंने सौ बार ऐसी मनमानी की है। यह दुराचारी दैत्य मुझ पर इतना आसक्त है कि क्षण भर के लिए भी मुझे अपने से अलग नही करता और बड़ी देखभाल के साथ मुझे इस सीसे के संदूक में छुपाकर समुद्र की तलहटी में रखता है। लेकिन उसकी सारी चालाकी और रक्षा प्रबंध पर भी मैं जो चाहती हूँ वह करती हूँ और इस बेचारे का सारा प्रबंध बेकार हो जाता है। अब मेरे हाल से तुम समझ लो कि स्त्री जब कामासक्त होती है तो कोई भी उसे दुष्कर्म से रोक नहीं सकता।

इसके पश्चात वह उनकी अँगूठियाँ लेकर अपनी जगह आई। उसने दैत्य का सिर फिर अपनी गोद में रख लिया और इन दोनों को संकेत किया कि चले जाओ। दोनों वहाँ से चल दिए और जब बहुत दूर निकल गए तो शाहजमाँ ने अपने बड़े भाई शहरयार से कहा, ‘देखिए, इतनी सुरक्षा और कड़े प्रबंध पर भी यह स्त्री अपने मन की अभिलाषा पूरी कर रही है।

यह भी देखिए कि दैत्य को उस पर कितना विश्वास है और वह उसकी निष्कलंकता की कैसी प्रशंसा कर रहा था। अब आप ही न्यायपूर्वक बताएँ कि इस बेचारे पर हम लोगों से अधिक दुर्भाग्य है या नहीं। हम जो बात ढूँढ़ने निकले थे वह हमें मिल गई। अब हमें चाहिए कि अपने-अपने देशों को चलें और किसी स्त्री से विवाह न करें क्योंकि शायद ही कोई स्त्री निष्पाप हो।

चुनांचे शहरयार ने अपने छोटे भाई के कहने के अनुसार ही काम किया और वहाँ से दोनों शहरयार की राजधानी को चले। तीन रातों बाद वे अपनी सेनाओं में पहुँचे। शहरयार ने आगे शिकार पर न जाना चाहा और राजधानी को वापस आ गया। महल में जाकर उसने मंत्री को आज्ञा दी कि वह बेगम को ले जाकर मृत्युदंड दे। मंत्री ने बादशाह की आज्ञानुसार ऐसा ही किया। फिर शहरयार ने दसों व्याभिचारिणी दासियों को अपने हाथ से मार डाला। इसके बाद शहरयार ने सोचा कि कोई ऐसा उपाय करूँ कि विवाह के बाद मेरी बेगम कुकर्म का अवसर ही ना पा सके। अतएव उसने निश्चय किया कि रात को विवाह करूँ और सबेरे ही बेगम को मरवा दूँ।

तत्पश्चात उसने अपने भाई शाहजमाँ को विदा किया। वह शहरयार की दी हुई अमूल्य भेंटों को लेकर अपनी सेना के साथ समरकंद चला गया। शाहजमाँ के जाने के बाद अपने प्रधान मंत्री को आज्ञा दी कि वह विवाह हेतु किसी सामंत की बेटी को लाए। प्रधान मंत्री ने एक अमीर की बेटी ला खड़ी की। शहरयार ने उससे विवाह किया और रात भर उसके साथ बिता कर सुबह मंत्री को आज्ञा दी कि इसे ले जाकर मार डालो और रात के लिए फिर किसी सरदार की सुंदरी बेटी मेरे विवाहार्थ ले आना। मंत्री ने उस बेगम को मार डाला और शाम को एक और अमीर की बेटी ले आया और दूसरे दिन उसे भी ले जाकर मार डाला।

इसी प्रकार शहरयार ने सैकड़ों अमीरों सरदारों की बेटियों से विवाह किया और दूसरी सुबह उन्हें मरवा डाला। अब सामान्य नागरिकों की बारी आई। साथ ही इस जघन्य अन्याय की बात सब जगह फैल गई। सारे नगर में शोक, संताप और रोदन की आवाजें उठने लगीं। कहीं पिता अपनी पुत्री को मृत्यु पर आठ-आठ आँसू रोता था, कहीं लड़की की माता पछाड़ें खाती थी। जो कन्याएँ अभी तक बच रही थीं उनके माता-पिता और सगे-संबंधी अत्यंत दुखी रहते थे। कई लोग अपनी बेटियों को लेकर देश छोड़ गए और अन्य देशों में जा बसे।

Story Of Shaharyar and Shahjaman

वहाँ के मंत्री की दो कुँआरी बेटियाँ थीं। बड़ी का नाम शहरजाद और छोटी का नाम दुनियाजाद था। शहरजाद अपनी बहन और सहेलियों से अधिक तीक्ष्ण बुद्धि थी। वह जो बात भी सुनती या किसी पुस्तक में देखती उसे कभी नहीं भूलती थी। वार्तालाप के गुण में भी प्रवीण थी। उसे बहुत प्राचीन मनीषियों की आख्यायिकाएँ और कविताएँ जुबानी याद थीं और स्वयं गद्य-पद्य रचना में निपुण थी।

इन सारे गुणों के अतिरिक्त उसमें अद्वितीय सौंदर्य भी था। एक दिन उसने पिता से कहा कि मैं आपसे कुछ कहना चाहती हूँ लेकिन आप को मेरी बात माननी होगी। मंत्री ने कहा, यदि तेरी बात मानने योग्य होगी तो मैं अवश्य मानूँगा। शहरजाद ने कहा कि मेरा निश्चय है कि मैं बादशाह को इस अन्याय से रोकूँ जो वह कर रहा है और जो कन्याएँ अभी बची हैं उनके माता-पिता को चिंतामुक्त कर दूँ।

मंत्री ने कहा, ‘बेटी, तुम यह हत्याकांड किस प्रकार रोक सकती हो। तुम्हारे पास कौन-सा उपाय ऐसा हो सकता है जिससे यह अन्याय बंद हो?’ शहरजाद बोली, ‘यह आपके हाथ में है। मैं आप को अपनी सौगंध देकर कहती हूँ कि मेरा विवाह बादशाह के साथ कर दीजिए।’ मंत्री यह सुनकर काँपने लगा और बोला, ‘बेटी, तू पागल हो गई है क्या जो ऐसी वाहियात बातें कर रही है। क्या तुझे बादशाह के प्रण का पता नहीं है? तू सोच- समझ कर बात किया कर। तू किस तरह बादशाह को इस अन्याय से रोक सकेगी? बेकार ही अपनी जान गँवाएगी।

शहरजाद ने कहा, ‘मैं बादशाह के प्रण को भली भाँति जानती हूँ, परंतु अपने इस विचार को किसी प्रकार न छोड़ूँगी। यदि मैं अन्य कन्याओं की भाँति मारी गई तो इस असार संसार से मुक्ति पा जाऊँगी और अगर मैंने बादशाह को इस अत्याचार से विमुख कर दिया तो अपने नगर निवासियों का बड़ा हित कर सकूँगी।’

मंत्री ने कहा, ‘मैं किसी प्रकार तेरी यह इच्छा स्वीकार नहीं कर सकता। मैं तुझे जानते-बूझते ऐसी विकट परिस्थिति में कैसे डाल सकता हूँ? अजीब-सी बात है कि तू मुझ से कहती है कि मेरी मौत का सामान कर दो। कौन-सा पिता ऐसा होगा जो अपनी प्यारी संतान के लिए ऐसा करने का सोच भी सकेगा। तुझे चाहे अपने प्राण प्यारे न हों लेकिन मुझ से यह नहीं हो सकता कि तेरे खून से हाथ रँगूँ।’ शहरजाद फिर भी अपनी जिद पर अड़ी रही और विवाह की प्रार्थी रही।

मंत्री ने कहा, तू बेकार ही मुझे गुस्सा दिला रही है। आखिर क्यों तू मरना चाहती है? क्यों अपने प्राणों से इतनी रुष्ट है? सुन ले, जो भी व्यक्ति किसी काम को बगैर सोच-विचार के करता है उसे बाद में पछताना पड़ता है। मुझे भय है कि तेरी दशा उस गधे की तरह न हो जाए जो सुख से रहता था किंतु मूर्खता के कारण दुख में पड़ा। शहरजाद ने कहा, यह कहानी मुझे बताइए। मंत्री ने कहानी सुनाई।

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Last Update: September 21, 2025

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